श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.25

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

चार्वङ्गुलिभ्यां पाणिभ्यामुन्‍नीय चरणाम्बुजम्।✎ 1904

मुखे निधाय विप्रेन्द्रो धयन्तं वीक्ष्य विस्मितः॥ २५

cārvaṅgulibhyāṃ pāṇibhyāmunnīya caraṇāmbujam|

mukhe nidhāya viprendro dhayantaṃ vīkṣya vismitaḥ|| 25

अर्थ

नन्हें-नन्हें हाथोंमें बड़ी सुन्दर-सुन्दर अँगुलियाँ थीं। वह शिशु अपने दोनों करकमलोंसे एक चरणकमलको मुखमें डालकर चूस रहा था। मार्कण्डेय मुनि यह दिव्य दृश्य देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये॥ २५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1904 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): चार्वंङ्गुलिभ्यां → चार्वङ्गुलिभ्यां

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