श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.9

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

परीक्षिदपि राजर्षिरात्मन्यात्मानमात्मना।

समाधाय परं दध्यावस्पन्दासुर्यथा तरुः॥ ९

parīkṣidapi rājarṣirātmanyātmānamātmanā|

samādhāya paraṃ dadhyāvaspandāsuryathā taruḥ|| 9

अर्थ

राजर्षि परीक्षित‍्ने भी बिना किसी बाह्य सहायताके स्वयं ही अपने अन्तरात्माको परमात्माके चिन्तनमें समाहित किया और ध्यानम‌ग्‍न हो गये। उस समय उनका श्‍वास-प्रश्‍वास भी नहीं चलता था, ऐसा जान पड़ता था मानो कोई वृक्षका ठूँठ हो॥ ९॥

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