राजर्षि परीक्षित्ने भी बिना किसी बाह्य सहायताके स्वयं ही अपने अन्तरात्माको परमात्माके चिन्तनमें समाहित किया और ध्यानमग्न हो गये। उस समय उनका श्वास-प्रश्वास भी नहीं चलता था, ऐसा जान पड़ता था मानो कोई वृक्षका ठूँठ हो॥ ९॥
परीक्षिदपि राजर्षिरात्मन्यात्मानमात्मना।
समाधाय परं दध्यावस्पन्दासुर्यथा तरुः॥ ९
राजर्षि परीक्षित्ने भी बिना किसी बाह्य सहायताके स्वयं ही अपने अन्तरात्माको परमात्माके चिन्तनमें समाहित किया और ध्यानमग्न हो गये। उस समय उनका श्वास-प्रश्वास भी नहीं चलता था, ऐसा जान पड़ता था मानो कोई वृक्षका ठूँठ हो॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 933) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/9/