श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.10

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्राक्कूले बर्हिष्यासीनो गंगाकूल उदङ्मुखः।

ब्रह्मभूतो महायोगी निःसंगश्छिन्‍नसंशयः॥ १०

prākkūle barhiṣyāsīno gaṃgākūla udaṅmukhaḥ|

brahmabhūto mahāyogī niḥsaṃgaśchinnasaṃśayaḥ|| 10

अर्थ

उन्होंने गंगाजीके तटपर कुशोंको इस प्रकार बिछा रखा था, जिसमें उनका अग्रभाग पूर्वकी ओर हो और उनपर स्वयं उत्तर मुँह होकर बैठे हुए थे। उनकी आसक्ति और संशय तो पहले ही मिट चुके थे। अब वे ब्रह्म और आत्माकी एकतारूप महायोगमें स्थित होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये॥ १०॥

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