श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.21

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तच्छ्रुत्वाऽऽजुहुवुर्विप्राः सहेन्द्रं तक्षकं मखे।

तक्षकाशु पतस्वेह सहेन्द्रेण मरुत्त्वता॥ २१

tacchrutvā''juhuvurviprāḥ sahendraṃ takṣakaṃ makhe|

takṣakāśu patasveha sahendreṇa maruttvatā|| 21

अर्थ

जनमेजयकी बात सुनकर ब्राह्मणोंने उस यज्ञमें इन्द्रके साथ तक्षकका अग्‍निकुण्डमें आवाहन किया। उन्होंने कहा—‘रे तक्षक! तू मरुद्गणके सहचर इन्द्रके साथ इस अग्‍निकुण्डमें शीघ्र आ पड़’॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें