श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.28

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यदा१ धर्मार्थकामेषु भक्तिर्भवति देहिनाम्।

तदा त्रेता रजोवृत्तिरिति जानीहि२ बुद्धिमन्॥ २८

yadā dharmārthakāmeṣu bhaktirbhavati dehinām|

tadā tretā rajovṛttiriti jānīhi buddhiman|| 28

अर्थ

जिस समय मनुष्योंकी प्रवृत्ति और रुचि धर्म, अर्थ और लौकिक-पारलौकिक सुख-भोगोंकी ओर होती है तथा शरीर, मन एवं इन्द्रियाँ रजोगुणमें स्थित होकर काम करने लगती हैं—बुद्धिमान् परीक्षित्! समझना चाहिये कि उस समय त्रेतायुग अपना काम कर रहा है॥ २८॥✎ 1453

टिप्पणियाँ

  1. १

    यदा कर्मसु काम्येषु भक्तिर्यशसि देहिनाम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 920)
  2. २

    नीत बुद्धिमान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 920)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1453 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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