श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.27

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

प्रभवन्ति यदा सत्त्वे मनोबुद्धीन्द्रियाणि च।

तदा कृतयुगं विद्याज्ज्ञाने तपसि यद् रुचिः॥ २७

prabhavanti yadā sattve manobuddhīndriyāṇi ca|

tadā kṛtayugaṃ vidyājjñāne tapasi yad ruciḥ|| 27

अर्थ

जिस समय मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ सत्त्वगुणमें स्थित होकर अपना-अपना काम करने लगती हैं, उस समय सत्ययुग समझना चाहिये। सत्त्वगुणकी प्रधानताके समय मनुष्य ज्ञान और तपस्यासे अधिक प्रेम करने लगता है॥ २७॥✎ 1453

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1453 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें