श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.16

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

इन्द्रियाणि शरानाहुराकूतीरस्य स्यन्दनम्।

तन्मात्राण्यस्याभिव्यक्तिं मुद्रयार्थक्रियात्मताम्॥ १६

indriyāṇi śarānāhurākūtīrasya syandanam|

tanmātrāṇyasyābhivyaktiṃ mudrayārthakriyātmatām|| 16

अर्थ

इन्द्रियोंको ही भगवान्‌के बाणोंके रूपमें कहा गया है। क्रियाशक्तियुक्त मन ही रथ है। तन्मात्राएँ रथके बाहरी भाग हैं और वर-अभय आदिकी मुद्राओंसे उनकी वरदान, अभयदान आदिके रूपमें क्रियाशीलता प्रकट होती है॥ १६॥

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