श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.11.17

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

मण्डलं देवयजनं दीक्षा संस्कार आत्मनः।

परिचर्या भगवत आत्मनो दुरितक्षयः॥ १७

maṇḍalaṃ devayajanaṃ dīkṣā saṃskāra ātmanaḥ|

paricaryā bhagavata ātmano duritakṣayaḥ|| 17

अर्थ

सूर्यमण्डल अथवा अग्‍निमण्डल ही भगवान्‌की पूजाका स्थान है, अन्तःकरणकी शुद्धि ही मन्त्रदीक्षा है और अपने समस्त पापोंको नष्ट कर देना ही भगवान्‌की पूजा है॥ १७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें