श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा

सांकेत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया ।

स्त्रैणान्‍नराद् यार्थतृषोऽनुशोच्यात्

क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती॥ ३२

aho mayā''tmā paritāpito vṛthā

sāṃketyavṛttyātivigarhyavārtayā |

straiṇānnarād yārthatṛṣo'nuśocyāt

krītena vittaṃ ratimātmanecchatī|| 32

अर्थ

बड़े खेदकी बात है, मैंने अत्यन्त निन्दनीय आजीविका वेश्यावृत्तिका आश्रय लिया और व्यर्थमें अपने शरीर और मनको क्लेश दिया, पीड़ा पहुँचायी। मेरा यह शरीर बिक गया है। लम्पट, लोभी और निन्दनीय मनुष्योंने इसे खरीद लिया है और मैं इतनी मूर्ख हूँ कि इसी शरीरसे धन और रति-सुख चाहती हूँ। मुझे धिक्कार है!॥ ३२॥

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