श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्यस्थूणं त्वचा रोमनखैः पिनद्धम्।

क्षरन्‍नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या॥ ३३

yadasthibhirnirmitavaṃśavaṃśyasthūṇaṃ tvacā romanakhaiḥ pinaddham|

kṣarannavadvāramagārametad viṇmūtrapūrṇaṃ madupaiti kānyā|| 33

अर्थ

यह शरीर एक घर है। इसमें हड्डियोंके टेढ़े-तिरछे बाँस और खंभे लगे हुए हैं; चाम, रोएँ और नाखूनोंसे यह छाया गया है। इसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे मल निकलते ही रहते हैं। इसमें संचित सम्पत्तिके नामपर केवल मल और मूत्र हैं। मेरे अतिरिक्त ऐसी कौन स्त्री है जो इस स्थूल शरीरको अपना प्रिय समझकर सेवन करेगी॥ ३३॥✎ 1740

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1740 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: शान्ति-लाभ → शान्तिलाभ

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