श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं

वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।

अकामदं दुःखभयाधिशोक-

मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा॥ ३१

santaṃ samīpe ramaṇaṃ ratipradaṃ

vittapradaṃ nityamimaṃ vihāya|

akāmadaṃ duḥkhabhayādhiśoka-

mohapradaṃ tucchamahaṃ bhaje'jñā|| 31

अर्थ

देखो तो सही, मेरे निकट-से-निकट हृदयमें ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान् विराजमान हैं। वे वास्तविक प्रेम, सुख और परमार्थका सच्चा धन भी देनेवाले हैं। जगत‍्के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं। हाय! हाय! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुच्छ मनुष्योंका सेवन किया जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते; उलटे दुःख-भय, आधि-व्याधि, शोक और मोह ही देते हैं। यह मेरी मूर्खताकी हद है कि मैं उनका सेवन करती हूँ॥ ३१॥

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