kapotakān kapotīṃ ca siddhārthaḥ prayayau gṛham|| 72
अर्थ
राजन्! वह बहेलिया बड़ा क्रूर था। गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चोंके मिल जानेसे उसे बड़ी प्रसन्नता हुई; उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना॥ ७२॥
तं लब्ध्वा लुब्धकः क्रूरः कपोतं गृहमेधिनम्।
कपोतकान् कपोतीं च सिद्धार्थः प्रययौ गृहम्॥ ७२
राजन्! वह बहेलिया बड़ा क्रूर था। गृहस्थाश्रमी कबूतर-कबूतरी और उनके बच्चोंके मिल जानेसे उसे बड़ी प्रसन्नता हुई; उसने समझा मेरा काम बन गया और वह उन्हें लेकर चलता बना॥ ७२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.72 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 762) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/72/