श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.71

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान् विचेष्टतः।

स्वयं च कृपणः शिक्षु पश्यन्‍नप्यबुधोऽपतत्॥ ७१

tāṃstathaivāvṛtāñchigbhirmṛtyugrastān viceṣṭataḥ|

svayaṃ ca kṛpaṇaḥ śikṣu paśyannapyabudho'patat|| 71

अर्थ

राजन्! कबूतरके बच्चे जालमें फँसकर तड़फड़ा रहे थे, स्पष्ट दीख रहा था कि वे मौतके पंजेमें हैं, परन्तु वह मूर्ख कबूतर यह सब देखते हुए भी इतना दीन हो रहा था कि स्वयं जान-बूझकर जालमें कूद पड़ा॥ ७१॥

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