॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.73
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वारामः पतत्त्रिवत्।
पुष्णन् कुटुम्बं कृपणः सानुबन्धोऽवसीदति॥ ७३
evaṃ kuṭumbyaśāntātmā dvandvārāmaḥ patattrivat|
puṣṇan kuṭumbaṃ kṛpaṇaḥ sānubandho'vasīdati|| 73
अर्थ
जो कुटुम्बी है, विषयों और लोगोंके संग-साथमें ही जिसे सुख मिलता है एवं अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें ही जो सारी सुध-बुध खो बैठा है, उसे कभी शान्ति नहीं मिल सकती। वह उसी कबूतरके समान अपने कुटुम्बके साथ कष्ट पाता है॥ ७३॥