॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.6.16
त्वत्तः पुमान् समधिगम्य यया स्ववीर्यं
धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्यः।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं
हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम्॥ १६
tvattaḥ pumān samadhigamya yayā svavīryaṃ
dhatte mahāntamiva garbhamamoghavīryaḥ|
so'yaṃ tayānugata ātmana āṇḍakośaṃ
haimaṃ sasarja bahirāvaraṇairupetam|| 16
अर्थ
यह पुरुष आपसे शक्ति प्राप्त करके अमोघवीर्य हो जाता है और फिर मायाके साथ संयुक्त होकर विश्वके महत्तत्त्वरूप गर्भका स्थापन करता है। इसके बाद वह महत्तत्त्व त्रिगुणमयी मायाका अनुसरण करके पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार और मनरूप सात आवरणों (परतों) वाले इस सुवर्णवर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करता है॥ १६॥✎ 1737 1738