श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तत्तस्थुषश्‍च जगतश्‍च भवानधीशो

यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।

अर्थांजुषन्‍नपि हृषीकपते न लिप्तो

येऽन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७

tattasthuṣaśca jagataśca bhavānadhīśo

yanmāyayotthaguṇavikriyayopanītān|

arthāṃjuṣannapi hṛṣīkapate na lipto

ye'nye svataḥ parihṛtādapi bibhyati sma|| 17

अर्थ

इसलिये हृषीकेश! आप समस्त चराचर जगत‍्के अधीश्‍वर हैं। यही कारण है कि मायाकी गुण विषमताके कारण बननेवाले विभिन्‍न पदार्थोंका उपभोग करते हुए भी आप उनमें लिप्त नहीं होते। यह केवल आपकी ही बात है। आपके अतिरिक्त दूसरे तो स्वयं उनका त्याग करके भी उन विषयोंसे डरते रहते हैं॥ १७॥✎ 1737 1738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1737 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अधो-गतिका → अधोगतिका
  • #1738 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जलाने-वाले → जलानेवाले

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