॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.6.15
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-
मव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्तः
कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम्॥ १५
asyāsi heturudayasthitisaṃyamānā-
mavyaktajīvamahatāmapi kālamāhuḥ|
so'yaṃ triṇābhirakhilāpacaye pravṛttaḥ
kālo gabhīraraya uttamapūruṣastvam|| 15
अर्थ
प्रभो! आप इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं; क्योंकि शास्त्रोंने ऐसा कहा है कि आप प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वके भी नियन्त्रण करनेवाले काल हैं। शीत, ग्रीष्म और वर्षाकालरूप तीन नाभियोंवाले संवत्सरके रूपमें सबको क्षयकी ओर ले जानेवाले काल आप ही हैं। आपकी गति अबाध और गम्भीर है। आप स्वयं पुरुषोत्तम हैं॥ १५॥✎ 1737 1738