श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।

वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम्॥ २३

dvārakāṃ hariṇā tyaktāṃ samudro'plāvayat kṣaṇāt|

varjayitvā mahārāja śrīmadbhagavadālayam|| 23

अर्थ

महाराज! भगवान्‌के न रहनेपर समुद्रने एकमात्र भगवान् श्रीकृष्णका निवासस्थान छोड़कर एक ही क्षणमें सारी द्वारका डुबो दी॥ २३॥✎ 1778

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1778 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: देने-वाला → देनेवाला

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