श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम्।

पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३०

sundarasmitavaktrābjaṃ nīlakuntalamaṇḍitam|

puṇḍarīkābhirāmākṣaṃ sphuranmakarakuṇḍalam|| 30

अर्थ

मुखकमलपर सुन्दर मुसकान और कपोलोंपर नीली-नीली अलकें बड़ी ही सुहावनी लगती थीं। कमलके समान सुन्दर-सुन्दर एवं सुकुमार नेत्र थे। कानोंमें मकराकृत कुण्डल झिलमिला रहे थे॥ ३०॥✎ 1774

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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