श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम्।✎ 1902

कौशेयाम्बरयुग्मेन परिवीतं सुमंगलम्॥ २९

śrīvatsāṅkaṃ ghanaśyāmaṃ taptahāṭakavarcasam|

kauśeyāmbarayugmena parivītaṃ sumaṃgalam|| 29

अर्थ

वर्षाकालीन मेघके समान साँवले शरीरसे तपे हुए सोनेके समान ज्योति निकल रही थी। वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न शोभायमान था। वे रेशमी पीताम्बरकी धोती और वैसा ही दुपट्टा धारण किये हुए थे। बड़ा ही मंगलमय रूप था॥ २९॥✎ 1774

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1774 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: एकाग्र-चित्तसे → एकाग्रचित्तसे
  • #1902 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): श्रीवत्सांङ्कं → श्रीवत्साङ्कं

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