श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

शरेषु क्षीयमाणेषु भज्यमानेषु धन्वसु।

शस्त्रेषु क्षीयमाणेषु मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः॥ २० ✎ 1235

śareṣu kṣīyamāṇeṣu bhajyamāneṣu dhanvasu|

śastreṣu kṣīyamāṇeṣu muṣṭibhirjahrurerakāḥ|| 20

अर्थ

अन्तमें जब उनके सब बाण समाप्त हो गये, धनुष टूट गये और शस्त्रास्त्र नष्ट-भ्रष्ट हो गये तब उन्होंने अपने हाथोंसे समुद्रतटपर लगी हुई एरका नामकी घास उखाड़नी शुरू की। यह वही घास थी, जो ऋषियोंके शापके कारण उत्पन्‍न हुए लोहमय मूसलके चूरेसे पैदा हुई थी॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1235 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मुष्टिभिर्जहृरेरका:॥ → मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः॥

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