॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.30.20
शरेषु क्षीयमाणेषु भज्यमानेषु धन्वसु।
शस्त्रेषु क्षीयमाणेषु मुष्टिभिर्जह्रुरेरकाः॥ २० ✎ 1235
śareṣu kṣīyamāṇeṣu bhajyamāneṣu dhanvasu|
śastreṣu kṣīyamāṇeṣu muṣṭibhirjahrurerakāḥ|| 20
अर्थ
अन्तमें जब उनके सब बाण समाप्त हो गये, धनुष टूट गये और शस्त्रास्त्र नष्ट-भ्रष्ट हो गये तब उन्होंने अपने हाथोंसे समुद्रतटपर लगी हुई एरका नामकी घास उखाड़नी शुरू की। यह वही घास थी, जो ऋषियोंके शापके कारण उत्पन्न हुए लोहमय मूसलके चूरेसे पैदा हुई थी॥ २०॥