श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृताः।

जघ्नुर्द्विषस्तैः कृष्णेन वार्यमाणास्तु तं च ते॥ २१

tā vajrakalpā hyabhavan parighā muṣṭinā bhṛtāḥ|

jaghnurdviṣastaiḥ kṛṣṇena vāryamāṇāstu taṃ ca te|| 21

अर्थ

हे राजन्! उनके हाथोंमें आते ही वह घास वज्रके समान कठोर मुद्गरोंके रूपमें परिणत हो गयी। अब वे रोषमें भरकर उसी घासके द्वारा अपने विपक्षियोंपर प्रहार करने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें मना किया, तो उन्होंने उनको और बलरामजीको भी अपना शत्रु समझ लिया। उन आततायियोंकी बुद्धि ऐसी मूढ़ हो रही थी कि वे उन्हें मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ पड़े॥ २१-२२॥

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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