श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

वायुना हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते।

सलिलं तद‍्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३

vāyunā hṛtagandhā bhūḥ salilatvāya kalpate|

salilaṃ taddhṛtarasaṃ jyotiṣṭvāyopakalpate|| 13

अर्थ

वायु पृथ्वीकी गन्ध खींच लेती है, जिससे वह जलके रूपमें हो जाती है और जब वही वायु जलके रसको खींच लेती है, तब वह जल अपना कारण अग्‍नि बन जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १३॥

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