श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।

हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४

hṛtarūpaṃ tu tamasā vāyau jyotiḥ pralīyate|

hṛtasparśo'vakāśena vāyurnabhasi līyate|| 14

अर्थ

जब अन्धकार अग्‍निका रूप छीन लेता है, तब वह अग्‍नि वायुमें लीन हो जाती है और जब अवकाशरूप आकाश वायुकी स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाशमें लीन हो जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १४॥

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