श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.3.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।

अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः॥ १२

tato virājamutsṛjya vairājaḥ puruṣo nṛpa|

avyaktaṃ viśate sūkṣmaṃ nirindhana ivānalaḥ|| 12

अर्थ

राजन्! उस समय जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, वैसे ही विराट् पुरुष ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड-शरीरको छोड़कर सूक्ष्मस्वरूप अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ १२॥

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