कमलनयन श्यामसुन्दर! आप शंकर आदि जगदीश्वरोंके भी ईश्वर हैं और मैं आपके चरणोंका प्रेमी भक्त हूँ। आप कृपा करके मुझे यह कर्मबन्धनसे मुक्त करनेवाली विधि बतलाइये॥ ५॥✎ 1765
एतत् कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम्।
भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर॥ ५
कमलनयन श्यामसुन्दर! आप शंकर आदि जगदीश्वरोंके भी ईश्वर हैं और मैं आपके चरणोंका प्रेमी भक्त हूँ। आप कृपा करके मुझे यह कर्मबन्धनसे मुक्त करनेवाली विधि बतलाइये॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 876) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)