श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

एतद् वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम्।

श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद॥ ४

etad vai sarvavarṇānāmāśramāṇāṃ ca sammatam|

śreyasāmuttamaṃ manye strīśūdrāṇāṃ ca mānada|| 4

अर्थ

मर्यादारक्षक प्रभो! यह क्रियायोग ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि वर्णों और ब्रह्मचारी-गृहस्थ आदि आश्रमोंके लिये भी परम कल्याणकारी है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि स्त्री-शूद्रादिके लिये भी यही सबसे श्रेष्ठ साधना-पद्धति है॥ ४॥✎ 1765

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1765 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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