putrebhyo bhṛgumukhyebhyo devyai ca bhagavān bhavaḥ|| 3
अर्थ
यह क्रियायोग पहले-पहल आपके मुखारविन्दसे ही निकला था। आपसे ही ग्रहण करके इसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र भृगु आदि महर्षियोंको और भगवान् शंकरने अपनी अर्द्धांगिनी भगवती पार्वतीजीको उपदेश किया था॥ ३॥✎ 1765
निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः॥ ३
यह क्रियायोग पहले-पहल आपके मुखारविन्दसे ही निकला था। आपसे ही ग्रहण करके इसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र भृगु आदि महर्षियोंको और भगवान् शंकरने अपनी अर्द्धांगिनी भगवती पार्वतीजीको उपदेश किया था॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.27.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 876) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/27/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)