श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.27.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

निःसृतं ते मुखाम्भोजाद् यदाह भगवानजः।

पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भवः॥ ३

niḥsṛtaṃ te mukhāmbhojād yadāha bhagavānajaḥ|

putrebhyo bhṛgumukhyebhyo devyai ca bhagavān bhavaḥ|| 3

अर्थ

यह क्रियायोग पहले-पहल आपके मुखारविन्दसे ही निकला था। आपसे ही ग्रहण करके इसे ब्रह्माजीने अपने पुत्र भृगु आदि महर्षियोंको और भगवान् शंकरने अपनी अर्द्धांगिनी भगवती पार्वतीजीको उपदेश किया था॥ ३॥✎ 1765

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1765 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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