मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥ २९
tā ye śṛṇvanti gāyanti hyanumodanti cādṛtāḥ|
matparāḥ śraddadhānāśca bhaktiṃ vindanti te mayi|| 29
अर्थ
जो लोग आदर और श्रद्धासे मेरी लीला-कथाओंका श्रवण, गान और अनुमोदन करते हैं, वे मेरे परायण हो जाते हैं और मेरी अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त कर लेते हैं॥ २९॥
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥ २९
जो लोग आदर और श्रद्धासे मेरी लीला-कथाओंका श्रवण, गान और अनुमोदन करते हैं, वे मेरे परायण हो जाते हैं और मेरी अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त कर लेते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 874) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/29/