परमभाग्यवान् उद्धवजी! संतोंके सौभाग्यकी महिमा कौन कहे? उनके पास सदा-सर्वदा मेरी लीला-कथाएँ हुआ करती हैं। मेरी कथाएँ मनुष्योंके लिये परम हितकर हैं; जो उनका सेवन करते हैं, उनके सारे पाप-तापोंको वे धो डालती हैं॥ २८॥
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथाः।
सम्भवन्ति हिता नॄणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८
परमभाग्यवान् उद्धवजी! संतोंके सौभाग्यकी महिमा कौन कहे? उनके पास सदा-सर्वदा मेरी लीला-कथाएँ हुआ करती हैं। मेरी कथाएँ मनुष्योंके लिये परम हितकर हैं; जो उनका सेवन करते हैं, उनके सारे पाप-तापोंको वे धो डालती हैं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 874) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/28/