श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

भक्तिं लब्धवतः साधोः किमन्यदवशिष्यते।

मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥ ३०

bhaktiṃ labdhavataḥ sādhoḥ kimanyadavaśiṣyate|

mayyanantaguṇe brahmaṇyānandānubhavātmani|| 30

अर्थ

उद्धवजी! मैं अनन्त अचिन्त्य कल्याणमय गुणगणोंका आश्रय हूँ। मेरा स्वरूप है—केवल आनन्द, केवल अनुभव, विशुद्ध आत्मा। मैं साक्षात् परब्रह्म हूँ। जिसे मेरी भक्ति मिल गयी, वह तो संत हो गया। अब उसे कुछ भी पाना शेष नहीं है॥ ३०॥

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