श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.25.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे।

स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा॥ ८

pravṛttilakṣaṇe niṣṭhā pumān yarhi gṛhāśrame|

svadharme cānutiṣṭheta guṇānāṃ samitirhi sā|| 8

अर्थ

जिस समय मनुष्य सकाम कर्म, गृहस्थाश्रम और स्वधर्माचरणमें अधिक प्रीति रखता है, उस समय भी उसमें तीनों गुणोंका मेल ही समझना चाहिये॥ ८॥

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