श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।

म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्‍निर्दारुसंयुतः॥ ४५

mā svasya karmabījena jāyate so'pyayaṃ pumān|

mriyate vāmaro bhrāntyā yathāgnirdārusaṃyutaḥ|| 45

अर्थ

यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मोंके बीजद्वारा न पैदा होता है और न तो मरता ही है; वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी भ्रान्तिसे वह उत्पन्‍न होता है और मरता-सा भी है, जैसे कि काष्ठसे युक्त अग्‍नि पैदा होता और नष्ट होता दिखायी पड़ता है॥ ४५॥

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