श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत्स्रोतसां तदिदं जलम्।

सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ ४४✎ 1229

so'yaṃ dīpo'rciṣāṃ yadvatsrotasāṃ tadidaṃ jalam|

so'yaṃ pumāniti nṛṇāṃ mṛṣā gīrdhīrmṛṣāyuṣām|| 44

अर्थ

जैसे यह उन्हीं ज्योतियोंका वही दीपक है, प्रवाहका यह वही जल है—ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय-चिन्तनमें व्यर्थ आयु बितानेवाले अविवेकी पुरुषोंका ऐसा कहना और समझना कि यह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है॥ ४४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1229 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें