॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.44
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत्स्रोतसां तदिदं जलम्।
सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ ४४✎ 1229
so'yaṃ dīpo'rciṣāṃ yadvatsrotasāṃ tadidaṃ jalam|
so'yaṃ pumāniti nṛṇāṃ mṛṣā gīrdhīrmṛṣāyuṣām|| 44
अर्थ
जैसे यह उन्हीं ज्योतियोंका वही दीपक है, प्रवाहका यह वही जल है—ऐसा समझना और कहना मिथ्या है, वैसे ही विषय-चिन्तनमें व्यर्थ आयु बितानेवाले अविवेकी पुरुषोंका ऐसा कहना और समझना कि यह वही पुरुष है, सर्वथा मिथ्या है॥ ४४॥