श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्‍न जायते॥ ९

tāvat karmāṇi kurvīta na nirvidyeta yāvatā|

matkathāśravaṇādau vā śraddhā yāvanna jāyate|| 9

अर्थ

कर्मके सम्बन्धमें जितने भी विधि-निषेध हैं, उनके अनुसार तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक कर्ममय जगत् और उससे प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि सुखोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय॥ ९॥

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