श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्।

न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥ ८

yadṛcchayā matkathādau jātaśraddhastu yaḥ pumān|

na nirviṇṇo nātisakto bhaktiyogo'sya siddhidaḥ|| 8

अर्थ

जो पुरुष न तो अत्यन्त विरक्त है और न अत्यन्त आसक्त ही है तथा किसी पूर्वजन्मके शुभकर्मसे सौभाग्यवश मेरी लीला-कथा आदिमें उसकी श्रद्धा हो गयी है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। उसे भक्तियोगके द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है॥ ८॥

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