श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव।

न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्‍न समाचरेत्॥ १०

svadharmastho yajan yajñairanāśīḥkāma uddhava|

na yāti svarganarakau yadyanyanna samācaret|| 10

अर्थ

उद्धव! इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें स्थित रहकर यज्ञोंके द्वारा बिना किसी आशा और कामनाके मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मोंसे दूर रहकर केवल विहित कर्मोंका ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरकमें नहीं जाना पड़ता॥ १०॥

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