ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ६
yogāstrayo mayā proktā nṛṇāṃ śreyovidhitsayā|
jñānaṃ karma ca bhaktiśca nopāyo'nyo'sti kutracit|| 6
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मैंने ही वेदोंमें एवं अन्यत्र भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये अधिकारिभेदसे तीन प्रकारके योगोंका उपदेश किया है। वे हैं—ज्ञान, कर्म और भक्ति। मनुष्यके परम कल्याणके लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है॥ ६॥
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ६
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मैंने ही वेदोंमें एवं अन्यत्र भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये अधिकारिभेदसे तीन प्रकारके योगोंका उपदेश किया है। वे हैं—ज्ञान, कर्म और भक्ति। मनुष्यके परम कल्याणके लिये इनके अतिरिक्त और कोई उपाय कहीं नहीं है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 834) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1226 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां