श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

गुणदोषभिदादृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः।

निगमेनापवादश्‍च भिदाया इति ह भ्रमः॥ ५

guṇadoṣabhidādṛṣṭirnigamātte na hi svataḥ|

nigamenāpavādaśca bhidāyā iti ha bhramaḥ|| 5

अर्थ

प्रभो! इसमें सन्देह नहीं कि गुण और दोषोंमें भेददृष्टि आपकी वाणी वेदके ही अनुसार है, किसीकी अपनी कल्पना नहीं; परन्तु प्रश्‍न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेदका निषेध भी करती है। यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा है। आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटाइये॥ ५॥

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