श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्।

छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः॥ ६

bhajanti ye yathā devān devā api tathaiva tān|

chāyeva karmasacivāḥ sādhavo dīnavatsalāḥ|| 6

अर्थ

जो लोग देवताओंका जिस प्रकार भजन करते हैं, देवता भी परछाईंके समान ठीक उसी रीतिसे भजन करनेवालोंको फल देते हैं; क्योंकि देवता कर्मके मन्त्री हैं, अधीन हैं। परन्तु सत्पुरुष दीनवत्सल होते हैं अर्थात् जो सांसारिक सम्पत्ति एवं साधनसे भी हीन हैं, उन्हें अपनाते हैं॥ ६॥

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