श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च।

सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम्॥ ५

bhūtānāṃ devacaritaṃ duḥkhāya ca sukhāya ca|

sukhāyaiva hi sādhūnāṃ tvādṛśāmacyutātmanām|| 5

अर्थ

देवताओंके चरित्र भी कभी प्राणियोंके लिये दुःखके हेतु, तो कभी सुखके हेतु बन जाते हैं। परन्तु जो आप-जैसे भगवत्प्रेमी पुरुष हैं—जिनका हृदय, प्राण, जीवन, सब कुछ भगवन्मय हो गया है—उनकी तो प्रत्येक चेष्टा समस्त प्राणियोंके कल्याणके लिये ही होती है॥ ५॥

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