श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

गत्युक्त्युत्सर्गोपादानमानन्दस्पर्शलक्षणम्।

आस्वादश्रुत्यवघ्राणमहं सर्वेन्द्रियेन्द्रियम्॥ ३६

gatyuktyutsargopādānamānandasparśalakṣaṇam|

āsvādaśrutyavaghrāṇamahaṃ sarvendriyendriyam|| 36

अर्थ

मैं ही पैरोंमें चलनेकी शक्ति, वाणीमें बोलनेकी शक्ति, पायुमें मल-त्यागकी शक्ति, हाथोंमें पकड़नेकी शक्ति और जननेन्द्रियमें आनन्दोपभोगकी शक्ति हूँ। त्वचामें स्पर्शकी, नेत्रोंमें दर्शनकी, रसनामें स्वाद लेनेकी, कानोंमें श्रवणकी और नासिकामें सूँघनेकी शक्ति भी मैं ही हूँ। समस्त इन्द्रियोंकी इन्द्रिय-शक्ति मैं ही हूँ॥ ३६॥

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