श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान्।

विकारः पुरुषोऽव्यक्तं रजः सत्त्वं तमः परम्॥ ३७

pṛthivī vāyurākāśa āpo jyotirahaṃ mahān|

vikāraḥ puruṣo'vyaktaṃ rajaḥ sattvaṃ tamaḥ param|| 37

अर्थ

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, अहंकार, महत्तत्त्व, पंचमहाभूत, जीव, अव्यक्त, प्रकृति, सत्त्व, रज, तम और उनसे परे रहनेवाला ब्रह्म—ये सब मैं ही हूँ॥ ३७॥

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