॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.16.32
ओजः सहो बलवतां कर्माहं विद्धि सात्त्वताम्।
सात्त्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं परा॥ ३२
ojaḥ saho balavatāṃ karmāhaṃ viddhi sāttvatām|
sāttvatāṃ navamūrtīnāmādimūrtirahaṃ parā|| 32
अर्थ
मैं बलवानोंमें उत्साह और पराक्रम तथा भगवद्भक्तोंमें भक्तियुक्त निष्काम कर्म हूँ। वैष्णवोंकी पूज्य वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, हयग्रीव, वराह, नृसिंह और ब्रह्मा—इन नौ मूर्तियोंमें मैं पहली एवं श्रेष्ठ मूर्ति वासुदेव हूँ॥ ३२॥✎ 1750