श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

विश्‍वावसुः पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम्।

भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुवः॥ ३३

viśvāvasuḥ pūrvacittirgandharvāpsarasāmaham|

bhūdharāṇāmahaṃ sthairyaṃ gandhamātramahaṃ bhuvaḥ|| 33

अर्थ

मैं गन्धर्वोंमें विश्‍वावसु और अप्सराओंमें ब्रह्माजीके दरबारकी अप्सरा पूर्वचित्ति हूँ। पर्वतोंमें स्थिरता और पृथ्वीमें शुद्ध अविकारी गन्ध मैं ही हूँ॥ ३३॥

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