॥ श्रीहरिः ॥
व्यवसायिनामहं लक्ष्मीः कितवानां छलग्रहः।
तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ३१
vyavasāyināmahaṃ lakṣmīḥ kitavānāṃ chalagrahaḥ|
titikṣāsmi titikṣūṇāṃ sattvaṃ sattvavatāmaham|| 31
अर्थ
मैं व्यापारियोंमें रहनेवाली लक्ष्मी, छल-कपट करनेवालोंमें द्यूतक्रीडा, तितिक्षुओंकी तितिक्षा (कष्टसहिष्णुता) और सात्त्विक पुरुषोंमें रहनेवाला सत्त्वगुण हूँ॥ ३१॥✎ 1750
व्यवसायिनामहं लक्ष्मीः कितवानां छलग्रहः।
तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ३१
मैं व्यापारियोंमें रहनेवाली लक्ष्मी, छल-कपट करनेवालोंमें द्यूतक्रीडा, तितिक्षुओंकी तितिक्षा (कष्टसहिष्णुता) और सात्त्विक पुरुषोंमें रहनेवाला सत्त्वगुण हूँ॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 812) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)