श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

रत्‍नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोशः सुपेशसाम्।

कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हविःष्वहम्॥ ३०

ratnānāṃ padmarāgo'smi padmakośaḥ supeśasām|

kuśo'smi darbhajātīnāṃ gavyamājyaṃ haviḥṣvaham|| 30

अर्थ

रत्‍नोंमें पद्मराग (लाल), सुन्दर वस्तुओंमें कमलकी कली, तृणोंमें कुश और हविष्योंमें गायका घी हूँ॥ ३०॥✎ 1750

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)

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