श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ।

श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि॥ ९

manmāyāmohitadhiyaḥ puruṣāḥ puruṣarṣabha|

śreyo vadantyanekāntaṃ yathākarma yathāruci|| 9

अर्थ

प्रिय उद्धव! सभीकी बुद्धि मेरी मायासे मोहित हो रही है; इसीसे वे अपने-अपने कर्म-संस्कार और अपनी-अपनी रुचिके अनुसार आत्मकल्याणके साधन भी एक नहीं, अनेकों बतलाते हैं॥ ९॥

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