मेरे स्वामी! आपने तो अभी-अभी भक्तियोगको ही निरपेक्ष एवं स्वतन्त्र साधन बतलाया है; क्योंकि इसीसे सब ओरसे आसक्ति छोड़कर मन आपमें ही तन्मय हो जाता है॥ २॥
भवतोदाहृतः स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षितः।
निरस्य सर्वतः संगं येन त्वय्याविशेन्मनः॥ २
मेरे स्वामी! आपने तो अभी-अभी भक्तियोगको ही निरपेक्ष एवं स्वतन्त्र साधन बतलाया है; क्योंकि इसीसे सब ओरसे आसक्ति छोड़कर मन आपमें ही तन्मय हो जाता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.14.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 798) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/14/2/