यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो॥ २२॥
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२
यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.11.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 784) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/11/22/